सदाशिवराव भाउ की पहचान इतिहास में एक ऐसे शख़्स के तौर पर है जिन्होंने आधुनिक युद्ध की शुरुआत की.
उन्होंने राष्ट्रवाद की भावना को आगे बढ़ाया और अपनी मातृभूमि से कई किलोमीटर दूर पानीपत में जाकर युद्ध लड़ा, जिसमें उन्होंने असीम पराक्रम का प्रदर्शन किया.
पानीपत के तीसरे युद्ध में अफ़ग़ान सम्राट अहमद शाह अब्दाली ने मराठा फ़ौज को हराया था. उस युद्ध में कई मराठा सैनिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. इस हार ने मराठा सामराज्य के तेज़ी से बढ़ते वर्चस्व को भी चुनौती दी थी.
चिमाजी अप्पा के बेटे सदाशिव राव बमुश्किल 30 साल की ज़िंदगी जी सके. उनका यह छोटा सा जीवन पेशवा शासनकाल के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा.
सदाशिव राव के नेतृत्व में भले ही मराठा फ़ौज को हार का सामना करना पड़ा लेकिन उनकी बहादुरी की गाथा आज भी हर कोई सुनाता है.
सदाशिव राव का जन्म 4 अगस्त 1730 को हुआ था. जब वो कुछ ही महीनों के थे तो उनकी मां का निधन का हो गया था और फिर दस साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया भी उठ गया.
सदाशिव राव का पालन उनकी दादी राधाबाई ने किया. रामचंद्र बाबा उनके गुरु थे.
उमाबाई सदाशिव राव की पहली पत्नी थी. दो बच्चों के जन्म के बाद उनकी मृत्यु भी जल्दी ही गई थी. इसके बाद सदाशिव राव ने पार्वतीबाई से शादी की, जिससे उन्हें कोई संतान नहीं हुई.
सदाशिव राव ने प्रशासन और राजनीति की बुनियादी शिक्षा सतारा में छत्रपति साहु की देखरेख में प्राप्त की. साल 1746 में उन्होंने कर्नाटक के तुंगभद्र दोआब की तरफ जाने वाली महदजीपंत की सेना में उनका साथ दिया.
सदाशिव राव ने अपना पहला युद्ध अजरा में जीता और वहां उन्होंने बदादुर भोंड किले पर फतह हासिल की.
वो तुंगभद्र की तरफ भी गए उन्होंने अपने पराक्रम से सवनूर के नवाब देसाई को चकित कर दिया. इस अभियान के तहत सदाशिवराव ने 35 विभागों पर कब्ज़ा किया जिसमें किट्टूर, मोकक, परसगढ़ और यडवाड शामिल हैं.
साल 1750 में सदाशिव को छत्रपति राजाराम का कमांडर नियुक्त किया गया. उसी साल कोल्हापुर के छत्रपति ने उन्हें पेशवा और जागिरदारी का कार्यभार भी सौंप दिया.
साल 1759 में उन्होंने उडगिर के निज़ाम के ख़िलाफ़ सफलतापूर्व जंग लड़ी. इस युद्ध ने उनके सैन्य शासन को और सुदृढता प्रदान की.
सदाशिव राव को आधुनिक युद्ध हथियारों की समझ थी, इसलिए उन्होंने इब्राहिम ख़ान गार्दी को अपनी सेना में शामिल किया.
सदाशिव जानते थे कि इब्राहिम ख़ान तोप चलाने में काफी निपुण हैं, उडगिर के युद्ध में 3 फ़रवरी 1760 को मराठा सैनिकों ने निज़ाम को परास्त कर बुरहानपुर, औरंगाबाद और बीजापुर के इलाकों को अपने कब्ज़े में कर लिया था.
उडगिर में सफ़लता प्राप्त करने के बाद, पेशवा की सेना उत्तर की तरफ बढ़ने के लिए तैयार थी. रघुनाथ राव ने पेशवा शासन पर 80 लाख रुपए का अतिरिक्त कर्ज का बोझ डाल दिया था इसलिए यह फ़ैसला किया गया कि अब उत्तर की तरफ होने वाले अभियान में रघुनाथराव की जगह सदाशिव राव सेना का नेतृत्व करेंगे.
इस अभियान में विश्वास राव भी उनके साथ गए.
इस अभियान के लिए मराठा फ़ौज 50 हज़ार सैनिक और छह लाख रुपयों के साथ आगे बढ़ी.
सदाशिव राव को बताया गया था कि अहमद शाह अब्दाली मुग़ल नहीं है और वो तुर्की के घोड़ों के साथ चलते हैं. साथ ही उन्हें गुरिल्ला युद्ध तकनीक भी आती है.
इतिहास के जानकारी और लेखक डॉ. उदय कुलकर्णी बताते हैं, ''सदाशिवराव को शायद शुजा, राजपूत, सूरजमल जाट से मदद मिल जाती लेकिन अब्दाली नजीबुदोल्ला, बंगश और बरेली के रोहिल्लाओं से मदद मिल रही थी. दोनों के बीच जो पत्र लिखे गए उनमें युद्ध को टालने की बातें थीं. जयपुर और जोधपुर के राजाओं ने अब्दाली का साथ देने का फ़ैसला किया. इसके साथ ही कई राजाओं को लगा कि अगर सदाशिव राव जीत गए तो वो उन पर अपना अधिकार जमा लेंगे इसलिए ये तमाम राजा भी अब्दाली के साथ चले गए.''
उदय कुलकर्णी बताते हैं, ''भाउ ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया था, एक तरह से उस समय मराठा भारत पर शासन कर रहे थे. पानीपत के युद्ध में मराठा और अब्दाली दोनों की सेनाएं अपने साथ अपने परिवालों को भी लेकर चल रहे थे. इसके अलावा कुछ श्रद्धालु भी थे जो पवित्रस्थलों की यात्रा के मकसद से दोनों सेनाओं के साथ शामिल थे. उन दिनों में आमतौर पर श्रद्धालु सेनाओं के साथ ही तीर्थयात्रा करते थे, जिससे लुटेरों का ख़तरा कम हो जाता था.''
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